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    Home»हिमाचल प्रदेश»सिरमौर»1964 से शुरू हुआ था नाहन फाऊंड्री का दुर्भाग्य
    सिरमौर

    1964 से शुरू हुआ था नाहन फाऊंड्री का दुर्भाग्य

    By Himachal VartaNovember 14, 2022
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    Nahan Foundryनाहन ( हिमाचल वार्ता न्यूज) (एसपी जैरथ):- सिरमौर के महाराज शमशेर प्रकाश का नाहन शहर के सन् 1875 में तराशा गया फाउंडरी का सपना सन् 1988 में पूरी तरह धराशाई हो गया था। जबकि देश की गुलामी जहां नाहन फाउंडरी के लिए सँजीवनी थी, तो वही भारत की आजादी इस खुशहाल फाउंडरी के लिए सबसे बड़ी दुर्भाग्य साबित हुई। सन् 1964 से लेकर आज तक नाहन के विकास में नाहन फाउंडरी को दिशा व दशा देने वाला एक भी न तो नेता मिल पाया है, और न ही कोई प्रशासनिक अधिकारी।जबकि आज भी यह नाहन फाउंडरी न केवल शहर के लिए बल्कि पूरे प्रदेश के लिए वरदान साबित हो सकती है। भले ही प्रदूषणो के कारण के चलते इस फाउंडरी को फिर से नही चलाया जा सकता। मगर इसकी कई एकड़ जमींन में शहर के भाग्य की रेखाएं बनी हुई है, केवल इसे कोई पढ़ नही पा रहा है। सन् 1964 में यह फैक्ट्री केंद्र सरकार से हिमाचल सरकार को हस्तांतरित हो गई थी। बस तभी से ही इसके दुर्भाग्य के दिन शुरू हो गए थे।यह वो विरासत है, जिसको सवारने और सजाने के लिए महाराजा सिरमौर को महारानी के गहने तक गिरवी रखने पड़ गए थे। महाराजा ने इस फाउंडरी को किसी भी सूरत में डूबने और टूटने नही दिया। इस फैक्ट्री में बने सयंत्र कोलकाता से लेकर लाहौर  तक, कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक अपनी गुणवत्ता का लोहा मनवाते थे। यही नही, नाहन फाउंडरी की बहुत सी जमीनी, संपत्तियां अन्य राज्यों में भी थी।मगर धन पिपासुओं की अनुचित महत्व आकांक्षाओं के चलते न केवल वह जमीने बिक गई, बल्कि फाउंडरी में रखे हुए बेशकीमती पुरातत्व की दृष्टि से महत्वपूर्ण दस्तावेज और इंग्लैंड, जर्मन आदि के बने ढेड़ सौ साल से भी पुराने उपकरणों को कबाड़ के दाम में बेचा गया। हालांकि यह सारा सामान बिक जाता, मगर एन वक्त पर नाहन के जागरूक मीडिया ने तुरंत अंकुश लगते हुए बचे हुए सामना को बचाया।

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