नाहन हिमाचलवार्ता न्यूज़ मेले हमारी ऐतिहासिक, प्राचीन धरोहरों को सहेजने के साथ-साथ आपसी भाईचारे व संस्कृति के आदान प्रदान में सदियों से अहम भूमिका निभाते रहे हैं। मेला कोई भी हो परंतु इसके मनाए जाने के पीछे धार्मिक अथवा ऐतिहासिक घटनाएं छुपी हुई है । जिनका उल्लेख बंुजुर्गों के मुखारविंद से सुनने को मिलता है ।
ृ हिमाचल प्रदेश में मनाए जाने वाले प्राचीन मेलों की श्रृंखला में से एक है जिला सिरमौर के रमणीक व प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर बोगधार में लगने वाला वार्षिक मेला। यह मेला जहां राजनीतिक व ऐतिहासिक तौर पर सिरमौर प्रजामण्डल आंदोलन का गवाह है तो वहीं धार्मिक आस्था के तहत स्थानीय देवता बिजट महाराज से जुडा हुआ है। ऐसे में जहां यह मेला न केवल हमारी धार्मिक मान्यताओं व आस्था का केन्द्र बिन्दु है, बल्कि इतिहास की कई महान घटनाओं को भी सहेजे हुए हैं। मेला कमेटी के सदस्य एचसी कमल के कथानुसार यह मेला प्रतिवर्ष ज्येष्ठ मास के 20 अथवा 21 प्रविष्ठे को आरंभ होकर तीन दिन तक मनाया जाता है । इस मेले का आयोजन वर्ष 1948 से लगातार किया जा रहा है। जहां यह मेला सिरमौर प्रजामण्डल आंदोलन द्वारा रियासती दमनचक्र के खिलाफ चलाए गए अभियान की जननी है तो वहीं इसी स्थान से चली सिरमौर प्रजामण्डल आन्दोलन की चिंगारी ने जहां गांव-2 में जाकर लोगों को जागरुक किया था । वहीं आजादी के बाद हिमाचल गठन की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल भी इसी मेले के दौरान हुई थी। बताते हैं कि सितम्बर, 1947 को बोगधार मेले के अवसर पर सिरमौर प्रजामण्डल के कार्यकर्ताओं ने रियासती दमनचक्र से मुक्ति पाने के लिए एक जलसे का आयोजन किया गया था। इस जलसे में डाॅ0 यशवन्त सिंह परमार , पं0 पदम देव, दिलीया राम, सही राम शर्मा इत्यादि शामिल हुए थे । रियासती सरकार ने मेले के दिन बोगधार में धारा 144 लगा दी थी । डाॅ0 यशवन्त सिंह परमार व अन्य साथियों को बिना जलसा किये हुए शिमला वापिस जाना पड़ा था । बताते हैं कि डाॅ0 यशवन्त सिंह परमार के बोगधार से चले जाने के बाद पंडित शिवानंद रमौल, डाॅ0 देवेन्द्र सिंह, लाला रामनाथ, ठाकुर बूटीनाथ, भागचन्द शामरी, पं0 नरहरि और हृदय राम पांथ इत्यादि ने क्षेत्र के गांव-2 जाकर जलसे किये तथा लोगों को रियासती सरकार की कथनी और करनी बारे जागरुक किया। ऐसे में इसी स्थान से चली प्रजामण्डल आंदोलन की चिंगारी ने जहां देश को कई स्वतंत्रता सेनानी दिए । वहीं ब्रिट्रिश हुकूमत से देश की आजादी का भी अहम हिस्सा बना। बता दें प्रजामंडल की याद में राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला बोगधार के प्रांगण में स्मृति पट्टिका लगाई गई है । इसके अतिरिक्त इस क्षेत्र के लोगों ने नाहन में छात्राओं के लिए होस्टल बनाने बारे हिप्र के तत्कालीन उप राज्यपाल को ज्ञापन भी सौंपा था ।
मेला समिति से जुडे लोगों का कहना है कि समय के साथ-2 हो रहे विभिन्न परिवर्तनों को ध्यान में रखते हुए मेले को ज्यादा आकर्षक व रोमांचकारी बनाने के लिए जहां यहां पर बाहर के व्यापारी वर्ग को आमंत्रित किया जाता है तो वही सांस्कृति व खेलकूद गतिविधियों को बढावा देने के लिए इनका आयोजन भी किया जाता है। इस वर्ष बोगधार मेले में 05 जून को पर्यावरण दिवस के अवसर पर महानाटी का आयोजन किया जा रहा है जिसमें क्षेत्र की एक हजार महिलाएं महानाटी डालकर लोगों जल और पर्यावरण के सरंक्षण का संदेश देगी । गौर रहे कि मेला कमेटी द्वारा प्रत्येक वर्ष प्रदेश के विभिन्न स्वतंत्रता सेनानीयों व उनके परिवाजनों के साथ-2 समाजिक कार्यों में बेहतर कार्य करने वाले लोगों को भी सम्मानित किया जाता है। ऐसे में हम कह सकते हैं कि आज भी यह मेला जहां हमारी धार्मिक आस्थाओं व संस्कृति का प्रतीक है तो वहीं ऐतिहासिक व राजनीतिक गतिविधियों का भी गवाह है।
मेला समिति से जुडे लोगों का कहना है कि समय के साथ-2 हो रहे विभिन्न परिवर्तनों को ध्यान में रखते हुए मेले को ज्यादा आकर्षक व रोमांचकारी बनाने के लिए जहां यहां पर बाहर के व्यापारी वर्ग को आमंत्रित किया जाता है तो वही सांस्कृति व खेलकूद गतिविधियों को बढावा देने के लिए इनका आयोजन भी किया जाता है। इस वर्ष बोगधार मेले में 05 जून को पर्यावरण दिवस के अवसर पर महानाटी का आयोजन किया जा रहा है जिसमें क्षेत्र की एक हजार महिलाएं महानाटी डालकर लोगों जल और पर्यावरण के सरंक्षण का संदेश देगी । गौर रहे कि मेला कमेटी द्वारा प्रत्येक वर्ष प्रदेश के विभिन्न स्वतंत्रता सेनानीयों व उनके परिवाजनों के साथ-2 समाजिक कार्यों में बेहतर कार्य करने वाले लोगों को भी सम्मानित किया जाता है। ऐसे में हम कह सकते हैं कि आज भी यह मेला जहां हमारी धार्मिक आस्थाओं व संस्कृति का प्रतीक है तो वहीं ऐतिहासिक व राजनीतिक गतिविधियों का भी गवाह है।
