ऊना ( हिमाचल वार्ता न्यूज)( राजकुमार शर्मा) पश्चिमी हिमालय आज एक अदृश्य किन्तु तीव्र संकट की गिरफ्त में है। यहाँ की वादियाँ, जो कभी शांति और प्राकृतिक संतुलन की प्रतीक थीं, अब बार-बार आने वाली बाढ़ों, भूस्खलनों और बादल फटने जैसी त्रासदियों से जूझ रही हैं। ये आपदाएँ अब केवल ‘प्राकृतिक’ नहीं रहीं — इनके पीछे जलवायु परिवर्तन, संवेदनशील भूगोल और मानव जनित हस्तक्षेप की एक गहरी और जटिल परस्पर क्रिया है। यह लेख इसी त्रिकोणीय संकट की परतों को उजागर करता है। जलवायु परिवर्तन: संकट की आधारशिला
वैश्विक तापमान में वृद्धि के प्रभाव हर भू-भाग पर समान नहीं होते। अनुसंधान बताते हैं कि हिमालयी क्षेत्र वैश्विक औसत से लगभग दोगुनी गति से गर्म हो रहा है। यह असमान ताप वृद्धि मानसूनी प्रवृत्तियों में गंभीर अस्थिरता ला रही है। वातावरण में बढ़ती आर्द्रता और गर्मी से बनी नमी-समृद्ध हवाएँ जब हिमालय की ऊँची ढलानों से टकराती हैं, तो तेजी से ऊपर उठकर संघनित होती हैं — यही प्रक्रिया बादल फटने की घटनाओं को जन्म देती है, जो अब अधिक सामान्य होती जा रही हैं। इसके अतिरिक्त, वायुमंडलीय रासायनिक संरचना में भी परिवर्तन देखा गया है। एरोसोल और ब्लैक कार्बन, जो मुख्यतः वाहन उत्सर्जन, बायोमास दहन और डीज़ल उपभोग से उत्पन्न होते हैं, वर्षा-बूँदों के निर्माण को प्रभावित करते हैं। इससे वर्षा अधिक तीव्र और विनाशकारी बन जाती है। इस प्रकार, जलवायु संकट केवल तापमान की बात नहीं रह गई है — यह अब एक बहुआयामी चुनौती है। भूगोल की भूमिका: नाजुकता की नीव। हिमालय विश्व की सबसे युवा पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। इसकी भौगोलिक संरचना अब भी भूगर्भीय रूप से सक्रिय है, जहाँ प्लेट टकराव और भूकंपीय गतिविधियाँ आम हैं। खड़ी ढलानें, नाजुक चट्टानें, और तीव्र ऊँचाई भिन्नताएँ इसे पहले से ही एक अस्थिर क्षेत्र बनाती हैं। जब अत्यधिक वर्षा या बर्फबारी होती है, तो पानी या बर्फ की परतें कमजोर भू-संरचना पर दबाव डालती हैं, जिससे भूस्खलन की आशंका बढ़ जाती है। ऐसे क्षेत्रों में कोई भी अतिरिक्त दबाव — चाहे वह सड़क निर्माण हो या पहाड़ी कटाई — भूगोल की इस असंतुलन को आपदा में बदल सकता है।
