नाहन (हिमाचलवार्ता)। हर वर्ष चार अगस्त को हम हिमाचल निर्माता डॉक्टर वाईएस परमार की जयंती मनाते है। डॉक्टर यशवंत सिंह परमार अपने आप में युग पुरुष थे , जिसने पहाड़ो की भोली-भाली, कम साक्षर व भौगोलिक परिस्थितियों से जूझ रही जनता को विकास के सपने दिखाए नहीं, बल्कि उनका पूरा ताना-बाना बुन कर भविष्य की राह पर अग्रसर भी किया। वह हिमाचल निर्माता डॉ. यशवंत सिंह परमार ही थे, जिन्होने एलएलबी व पीएचडी होने के बावजूद धन-दौलत या उच्च पदो का लोभ नही किया, बल्कि सर्वस्व प्रदेशवासियों को पहाड़ी होने का गौरव दिलाने में न्यौछावर कर दिया। परमार हिमाचल की राजनीति के पुरोधा व प्रथम मुख्यमंत्री ही नहीं थे, वह एक राजनेता से कहीं बढ़कर जननायक व दार्शनिक भी थे, जिनकी तब की सोच पर आज प्रदेश चल रहा है। कृषि-बागवानी से लेकर वानिकी के विस्तार सहित जिन प्राकृतिक संसाधनों पर आज प्रदेश इतरा रहा है, भविष्य का यह दर्शन उन्हीं का था। वह कहा करते थे कि सड़के पहाड़ो की भाग्य रेखाएं है और आज यही प्रदेश की आर्थिकी की रीढ़ है। शिक्षा एवं स्वास्थ्य को लेकर उनका स्पष्ट विजन था, जिस पर उनके बाद की सरकारों ने पूरा ध्यान दिया, जबकि औद्योगिकीकरण के साथ विकास की रफ्तार पर भी वह चल पड़े थे। इसी तरह पशुपालन से समृद्धि की राह भी वह देखा करते थे, जिसके लिए उनके समय प्रयास भी हुए और पहाड़ो की लोक सभ्यता व संस्कृति के तो वह साक्षात उदाहरण थे, जिसके लिए उन्होंने कार्य ही नहीं किए बल्कि वैसा ही पारंपरिक व सादगी का जीवन व्यतीत भी किया। यशवंत सिंह परमार की ईमानदारी व पाक राजनीतिक जीवन का इससे बड़ा प्रमाण नहीं होगा, कि अपने अंतिम समय मे भी उनके बैंक खाते मे 563 रुपये 30 पैसे थे। मुख्यमंत्री बनने के बाद भी उन्होंने कोई मकान नहीं बनवाया, कोई वाहन नहीं खरीदा, अपने परिवार के किसी व्यक्ति या रिश्तेदार को प्रभाव से नौकरी नहीं लगवाया और जब वह मुख्यमंत्री नहीं थे तो सामान्य बस मे सफर करते थे। पर्यावरण की जिस चिंता में आज देश-प्रदेश ही नहीं पूरा विश्व डूबा है, उस कर्मयोद्धा ने इसकी आहट को दशको पहले ही सुन लिया था। एक भाषण में उन्होंने कहा था वन हमारी बहुत बड़ी संपदा है, सरमाया है। इनकी हिफाजत हर हिमाचली को हर हाल मे करनी है, नंगे पहाड़ो को हमें हरियाली की चादर ओढ़ाने का संकल्प लेना होगा। प्रत्येक व्यक्ति को एक पौधा लगाना होगा और पौधे ऐसे हो जो पशुओं को चारा दे, उनसे बालन मिले और बड़े होकर इमारती लकड़ी के साथ आमदनी भी दे। एक मंत्र और सुन ले केवल पौधा लगाने से कुछ नहीं होगा, उसे पालना व संभालना होगा। वनों के त्रिस्तरीय उपयोग को लेकर परमार का कहना था कि कतारो मे लगाए इमारती लकड़ी के जंगल प्रदेश के फिक्स डिपोजिट होगे। बाग-बगीचे लगाकर हम तो संपन्न हो सकते है, लेकिन वानिकी से पूरा प्रदेश संपन्न होगा। वह राजनीति में पारदर्शिता के उदाहरण व प्रदेश में कृषि-बागवानी के प्रबल समर्थक थे मुख्यमंत्री त्यागने के बाद भी उनकी सादगी देखते ही बनती थी। वह कहते थे मेरा सपना हिमाचल को पूर्ण राज्य बनाना था, अब भले ही मै मुख्यमंत्री नही तो क्या एक साधारण नागरिक ही बनकर रहना चाहता हूं। डॉ. परमार प्रदेश को कृषि-बागवानी में सिरमौर और पहाड़ो को इससे भी हरा-भरा बनाना चाहते थे, जिसके लिए उन्होंने नौणी मे इन्हीं विषय का विश्वविद्यालय भी स्थापित करवाया। अपने भाषण में उन्होंने लोगों को खेती-बाड़ी के साथ वानिकी की ओर भी ध्यान देने को कहा और उस समय जनसंपर्क विभाग के निदेशक रहे चतर सिंह की ओर देखते हुए कहा कि इलाके में जितने भी कैथ के पेड़ है, सब पर नाशपाती की कलम लगा दो। परमार तब भी और आज भी प्रत्येक प्रदेशवासी के लिए आदर्श है। बतौर राजनेता एवं मुख्यमंत्री हिमाचल की जो नींव रखी, बाद की सभी सरकारों ने उसे सीचने का कार्य किया और उनकी सोच की विरासत पर चलकर ही आज यह पहाड़ी प्रांत देश-दुनिया में पहाड़ी राज्यों का मॉडल बनकर उभरा है। परमार ने हिमाचल में विकास का जो मॉडल तैयार किया था, कांग्रेस हो या भाजपा दोनों सरकारों ने उसे अपनाकर, उसी के इर्द-गिर्द कार्य किया और परिणाम स्वरूप राज्य नित नए आयाम स्थापित कर रहा है।
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Sunday, July 5
