नाहन 06 जुलाई (हिमाचल वार्ता न्यूज) :- ।देवठी मझगांव में बीते दो दिन से चल रहा टकराल देवता का शांद महायज्ञ कुरूड़ स्थापना के साथ संपन हो गया । इस दो दिवसीय महायज्ञ में परघेल व रासूमांदर तथा सीमा पर लगते शिमला जिला के अनेक क्षेत्रों से आए हजारों लोगों ने रूद्र महाराज अर्थात टकराल देवता का प्रसाद व आर्शिवाद प्राप्त किया । इस मौके पर देवता के नाम पर भंडारे का आयोजन भी किया गया । इससे पहले पांच जुलाई की रात्रि को मंदिर में मशाल यात्रा निकाली गई जिसमें क्षेत्र के हजारों लोगों ने भाग लिया । स्थानीय लोगों के अनुसार देवता के आगमन पर अंधेरी रात्रि को उजाला में परिवर्तित किया जाता है । इसके उपरांत लोगों को ददोण का प्रसाद वितरित किया गया ।
जाने माने साहित्यकार एवं देवठी मझगांव के पूर्व प्रधान विद्यानंद सरैक ने बताया कि देवठी मझगांव में दो रूद्र देवता पशुपति और भूतपति महादेव के नाम से जाने जाते हैं । पशुपति महादेव का प्रादुर्भाव दही के मंथन से हुआ था जबकि भूतपति महादेव अर्थात टकराल देवता का इतिहास भी इस क्षेत्र के रियासती ठकुराई से जुड़ा है। उन्होने बताया कि कुरूड़ को मंदिर का मुकुट माना जाता है । कुरूड़ के लिए देवलुओं द्वारा शांद से पहले ही देवदार वृक्ष का चयन किया जाता है जिसे बाहरी ओर से छिलकर निर्मित किया जाता है । शांद के लिए निकले मुहूर्त के अनुसार कुरूड़ का पूजन करके जंगल से सीधा उठाकर लाया जाता है और इसे सीधे तौर पर मंदिर से सबसे ऊंचे सिरे पर स्थापित किया जाता है । कुरूड़ लाने में क्षेत्र के सैंकड़ों लोगों द्वारा सहयोग दिया गया । जनश्रुति के अनुसार जब कुरुड को उठा लिया जाता है तो इसे भूमि पर नहीं रख जा सकता है । इसे मंदिर के शीर्ष पर ही स्थापित करना होता है ।
उन्होने बताया कि कुरुड़ स्थापना एक जटिल प्रक्रिया है लेकिन जहां इतनी देव आस्था और देवता का आशीर्वाद हो तो वहां असम्भव कार्य भी सम्भव हो जाता है। कुरूड़ स्थापित होने के उपरांत रूद्र अर्थात टकराल देवता के गुर ने देववाणी द्वारा मंदिर की छत पर से लोगों को सफल आयोजनधगई थी ।
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Tuesday, October 20
