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    Home»चण्डीगढ़»भारत सबका साझा, विचारों की असहमति देश-द्रोह नहीं-रवीश ने गरमाई बहस
    चण्डीगढ़

    भारत सबका साझा, विचारों की असहमति देश-द्रोह नहीं-रवीश ने गरमाई बहस

    By Himachal VartaDecember 15, 2019
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    मिलिट्री लिटरेचर फेस्टिवल-2019
    ‘एक और सत्याग्रह भारत की आत्मा के लिए’ विषय पर पैनल विचार-विमर्श के दौरान नागरिकता संशोधन बिल का मुद्दा रहा हावी
    चंडीगढ़। प्रसिद्ध पत्रकार श्री रवीश कुमार ने आज नागरिकता संशोधन बिल पर बहस को गरमाते हुए कहा कि भारत सब धर्मों, फिरकों और जातियों का साझा देश है, इसलिए किसी व्यक्ति का किसी बात के साथ असहमत होना देश-द्रोह नहीं कहा जा सकता।
    लेक क्लब में मिलिट्री लिटरेचर फेस्टिवल-2019 के दूसरे दिन ‘एक और सत्याग्रह भारत की आत्मा के लिए’ विषय पर पैनल विचार-विमर्श के दौरान सम्मिलन करते हुए उन्होंने इस तथ्य पर ध्यान दिलाया कि देश के प्रति अपनी वफ़ादारी और राष्ट्रीयता को परिभाषित करने के लिए धर्म को इकमात्र मापदंड बनाया जा रहा है।
    विचार-विमर्श सैशन के दौरान श्री रवीश कुमार के अलावा श्री आनन्दपुर साहिब से संसद मैंबर श्री मनीश तिवाड़ी और दिल्ली यूनिवर्सिटी से श्रीमती गीता भट्ट शामिल हुए जबकि लैफ्टिनैंट जनरल (सेवा-मुक्त) श्री ज़मीरुद्दीन शाह, पूर्व डिप्टी चीफ़ ऑफ आर्मी स्टाफ ने सैशन की कार्यवाही चलाई।
    श्री रवीश कुमार ने अपने विचार जारी रखते हुए कहा कि राष्ट्रवाद को परिभाषित करने का आधार धर्म नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि मीडिया को एक निष्पक्ष संस्था होना चाहिए परन्तु आज कल ऐसा नहीं है क्योंकि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता मीडिया ‘असहमति के अधिकार’ के छीने और दबाए जाने पर चिंता ज़ाहिर नहीं कर रहा। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि आज सवाल पूछना जुर्म बन गया है।
    दिल्ली यूनिवर्सिटी के टीचिंग स्टाफ से पहुँचे गीता भट्ट ने अपने विचार पेश करते हुए कहा कि भारत की सभ्यता का इतिहास कई युग पुराना है, जहाँ कई सभ्यताएं प्रफुल्लित हो रही हैं। नागरिकता संशोधन बिल का समर्थन करते हुए उन्होंने कहा कि इस बिल का उद्देश्य हाशीए पर खड़े उन वर्गों को सुविधा देना है, जो दूसरे देशों में धार्मिक ज़ुल्म का सामना कर रहे हैं।
    सैशन के दौरान अपने विचार प्रकट करते हुए संसद मैंबर श्री मनीश तिवाड़ी ने कहा कि धर्म निरपेक्षता आज के संदर्भ में बहुत अहमीयत रखता है। उन्होंने कहा कि वास्तव में दो राष्ट्रों का सिद्धांत पहली बार 1909 में भाई परमानन्द ने दिया। फिर 1930 में अल्लामा इकबाल, 1937 में सावरकर और 1940 में मुहम्मद अली जिऩाह ने इस सिद्धांत को आगे बढ़ाया। उन्होंने कहा कि 1947 की विभाजन के समय पर तबकी केंद्र सरकार ने धर्म निरपेक्ष ढांचे को देश हित में चुना जिससे विघटनकारी ताकतों को रोका जा सके परन्तु यह विघटनकारी ताकतें इन दिनों फिर सर उठा रही हैं।
    नागरिकता संशोधन बिल का विरोध करते हुए श्री तिवाड़ी ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानूनों के मुताबिक धर्म के आधार पर पक्षपात न करके, शरणार्थियों को पनाह देना हर देश का पहला फर्ज़ है।

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