हिमाचल निर्माता के नाम का हुआ राजनीतिकरण परन्तु परिवार आज भी उपेक्षित
नाहन। आखिर साल में एक बार सरकार वर्तमान राजनीति संगठन सहित सामाजिक संगठन हिमाचली माता को याद कर ही लेते हैं। आज डॉक्टर यशवंत सिंह परमार की जन्म तिथि है। जिसे सरकार व कांग्रेस धूमधाम से मनाती है। 2006 से पहले सिरमौर में डॉ यशवंत सिंह परमार के नाम पर ना कोई स्मारक था और ना ही कोई उनके नाम पर जगह या शहर का नाम था। सिरमौर में सबसे पहले बिरोजा फैक्ट्री जड़जा की आवासीय कॉलोनी का नाम यशवंत विहार रखा गया। जिसका श्रेय सबसे पहला डॉक्टर परमार के नाम पर सिरमौर में जगह का नाम उनके सम्मान में मौजूदा प्रदेश कांग्रेस महासचिव अजय सोलंकी को जाता है।जिसके बाद इस नाम का राजनीतिकरण भी शुरू हो चुका था और फिर नाहन शहर माल रोड के समीप चौक का नाम यशवंत चौक रखा गया। जहां पर डॉ वाईएस परमार की प्रतिमा भी स्थापित की गई और आज यह प्रतिमा जिला सिरमौर में आने वाले तमाम नेताओं के लिए एक औपचारिक वजह भी बन गई है। विडंबना भी यह है कि डॉ वाईएस परमार के चले जाने के बाद उनके स्मारक व प्रतिमा आदि के आगे तो सब नतमस्तक होते हैं मगर बीजेपी का अब नाम डॉ वाईएस परमार के परिवार से जुड़ जाने के बाद भी जो वास्तविक सम्मान इस परिवार को मिलना चाहिए था वह सरकार नहीं दे पाई है।
जबकि नाहन के विधायक डॉ बिंदल ने कांग्रेस सरकार में उपेक्षित रहे डॉ यशवंत सिंह परमार के पुत्र कुश परमार के पुत्र की मार्फत कांग्रेस के नाम के सम्मान पर भी सेंधमारी करने में कामयाब रहे थे। यानी परमार फैमिली परफेक्ट कांग्रेस का नाम हटाते हुए उन्हें बीजेपी का यानी हिमाचल निर्माता के नाम का भगवाकरण भी कर डाला। जिसके बाद पूरे प्रदेश में बड़ी हलचल भी मच गई थी। कुश परमार के बेटे चेतन परमार का कांग्रेस छोड़कर बीजेपी को ज्वाइन कर लेना कोई गलत नहीं था। मगर जिस सम्मान के साथ और मान के साथ इस बड़े नाम को कैश किया जाना था।
अब हालात यह है कि डॉक्टर जसवंत सिंह परमार यानी हिमाचल निर्माता को तो लाखों करोड़ों रुपए खर्च कर याद कर लिया जाता है। मगर उनके पुत्र और पौत्र दोनों को कोई बोर्ड या निगम दे पाने में जयराम सरकार असफल रही है। जिसको लेकर ना केवल सिरमौर बल्कि प्रदेश में हिमाचल निर्माता के फैन काफी नाराज भी हैं। यही नहीं हिमाचल निर्माता डॉ वाईएस परमार की जन्मस्थली से लेकर उनके गृह क्षेत्र में भी ना तो उनके मकान का जीर्णोद्धार किया गया है और ना ही उनके गांव तक जाने वाली सड़क की हालत पिछले 30 वर्षों से सुधर पाई है।
ऐसे में आज के दिन डॉ वाईएस परमार को याद करना एक तरह का बड़ा मजाक भी माना जा सकता है। इसे हम मतलब परस्ती की राजनीति भी कह सकते हैं। बरहाल जिस व्यक्तित्व की वजह से आज हम खुद को देवभूमि यानी पहाड़ी कहने का गर्व महसूस करते हैं उसके पीछे अगर किसी का बड़ा नाम है तो वह है डॉ यशवंत सिंह परमार।
