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    Home»हिमाचल प्रदेश»राष्ट्रवादी राजनीति के तत्वचिंतक थे, प.दीन दयाल उपाध्याय-डा. बिन्दल
    हिमाचल प्रदेश

    राष्ट्रवादी राजनीति के तत्वचिंतक थे, प.दीन दयाल उपाध्याय-डा. बिन्दल

    By Himachal VartaSeptember 25, 2020
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    कांग्रेस ने द्वि-राष्ट्र के सिद्धांत के आगे घुटने टेक दिए किन्तु जनसंघ ने इसे मानसिक रूप से स्वीकार नहीं किया

    नाहन (हिमाचलवार्ता)। विधायक एवं पूर्व विधानसभा अध्यक्ष डा. राजीव बिन्दल ने पंडित दीन दयाल उपाध्याय की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि पंडित दीन दयाल उपाध्याय जी राष्ट्र समर्पित महापुरूष थे जो जनसंघ विचारक, प्रचारक, संगंठक एवं राजनैतिक योजनाकर चारों रूप में विद्यमान रहे। उन्होंने कहा कि अखंड भारत का विचार, चिंतन ही पंडित दीन दयाल जी का जीवन दर्शन था।
    डा. बिन्दल आज पंडित दीन दयाल उपाध्याय की 104वीं जयंती के अवसर पर भाजपा कार्यकर्ताओं से संवाद कर रहे थे। नाहन मंडल के तहत आज सभी बूथों पर पंडित दीन दयाल उपाध्याय जो की जयंती पर उन्हें श्रद्धासुमन भेंट किए गए और उनके दिखाए गए मार्ग पर निरंतर आगे बढ़ने का संकल्प दोहराया।
    डा. बिन्दल ने कहा कि पंडित दीन दयाल जी ने हमेशा कहा कि भारत का विभाजन उसकी अपनी मूल संस्कृति के विरूद्ध है। वास्तव में एक देश, एक राष्ट्र तथा एक संस्कृति के सिद्धांत पर जनसंघ को पूर्ण विश्वास रहा पर कांग्रेस ने द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत के सामने घुटने टेक दिए, किन्तु जनसंघ ने मानसिक रूप से इसे कभी स्वीकार नहीं किया।
    डा. बिन्दल ने कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय और संघ के अन्य महान चिंतकों और मार्गर्शकों के अनुरूप जनसंघ अपने इस मूल सिद्धांत के साथ आज भी आगे बढ़ रहा है कि-‘‘एक ही राष्ट्र के दो भाग फिर से एक होंगे तथा अखंड भारत का निर्माण होगा।
    उन्होंने कहा कि काश्मीर के विषय में, 29 जून, 1952 को जनसंघ ने कश्मीर दिवस मनाया, काश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और धारा 370 को निरस्त करना होगा, इसको देश भर में विषय बनाया गया। आज पंडित दीन दयाल उपाध्याय व डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का स्वपन साकार हुआ। इसी प्रकार असम के बारे में, 1961 में जनसंघ ने प्रस्ताव पारित करके असम में चली आ रही पाकिस्तान की घुसपैठ को राष्ट्रद्रोह का नाम दिया और देश भर में जनजागरण अभियान चलाया।
    डा. बिन्दल ने कहा कि पंडित दीन दयाल जी का चिंतन, समन्वय बैठाने का चिंतन रहा, व्यक्ति स्वातंत्रय और सामाजिक अनुशासन, आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय, विविधता में एकता यह सब इसमें समाहित रहा।
    उन्होंने कहा कि पंडित दीन दयाल जी का विचार था कि सामाजिक सुव्यवस्था और राज्य विहीनता, विशेषज्ञता और समग्रता, भौतिक प्रगति और आध्यात्मिक उन्नति, स्वतंत्रता चाहिए पर स्वेच्छाचार नहीं, अनुशासन चाहिए पर सांचाबंद अवस्था नहीं, प्रतिष्ठा चाहिए पर सुविधाओं की गठरी नहीं, एकता चाहिए-पर एक रूपता नहीं, प्रौद्योगिक प्रगति चाहिए पर मानवीय गुणों का लोप नहीं, रोजगार के बढ़ते अवसर चाहिए पर अव्यवस्था नहीं, और इसी प्रकार निचले स्तर पर छोटी-छोटी योजनाएं और राष्ट्रीय स्तर पर वृहत योजनाएं। अन्तयोदय अर्थात अन्तिम पायदान पर बैठे व्यक्ति का उत्थान एवं राष्ट्रवाद का सर्वागीण विकास।
    उन्होंने कहा कि गांधी जी, लोहिया जी, और दीनदयाल जी ये तीनों आधुनिक भारत के विचारक हुए। पंडित दीन दयाल जी का विचार आज भाजपा के रूप में बढता हुआ दिखाई देता है।

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