नाहन 08 दिसम्बर (हिमाचल वार्ता न्यूज़) :- इन दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उपचुनाव में हुई हार को लेकर फीडबैक जुटाने में लगा है। तो वही लगातार फीडबैक के बाद सत्ता व संगठन में फेरबदल के शो से उल्कापिंड बने प्रदेश की राजनीति के आसमान पर विचरण कर रहे हैं। हालांकि सच्चाई क्या है यह संगठन भी जानता है और सरकार भी बावजूद इसके अनुशासन का काजल उनकी आंखों में डाला जा रहा है जिनका रणनीति में रोल ही नहीं था।
इससे एक बात तो साफ हो जाती है कि यदि जिम्मेदारी का ठीकरा से सर फोड़ना है तो निर्णय लेने से पहले वह भी अपने सामर्थ्य का परिचय दें। साथ ही लिए गए निर्णय में तकदीग दस्तावेज भी हार और जीत के मंथन पर रखा जाए। उपचुनाव हुए अब समय भी काफी हो चुका है बावजूद इसके संगठन व सरकार पर जिस तरह की टीका टिप्पणी आ रही है उससे कार्यकर्ता पशोपेश में है।
तो मंत्रिमंडल मानसिक दबाव से भी गुजर रहा है। अनुशासन के दंड का दबाव अब यदि चुनावी वर्ष में सुधार की जगह परिवर्तन में लगाया जाता है तो कहा जा सकता है कि 2022 भाजपा के लिए नुकसानदायक नजर आता है। बड़ी बात तो यह है कि प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में यह पहला अवसर होगा कि सरकार का हर मंत्री फिलहाल बेदाग और इमानदार है।
मगर अब सेमीफाइनल की हार के बाद हर स्थिति बिलकुल विपरीत है। सबको यह भी मालूम है कि टिकट आवंटन में मुख्य भूमिका किसकी रही है। यही नहीं जुब्बल कोटखाई सीट को लेकर भाजपा मंडल ने पूर्ण रूप से इस्तीफा देते हुए इस चीज को साबित भी कर दिया था। तो वही सोलन के निगम चुनाव के बाद जब संगठन को मालूम था कि चुनाव भाजपा वर्सेस कांग्रेस ना होकर गुटबाजी प्रखर था। तो अर्की उपचुनाव में प्रभारी सिरमौर से क्यों भेजा गया।
जाहिर सी बात है कहीं ना कहीं संगठन से जुड़े एक विशेष व्यक्ति का खुद को योगी का प्रतिरूप साबित करना कहीं ना कहीं उनकी रणनीति का हिस्सा रहा है। जबकि मंत्री मंडल प्रमुख को यह मालूम था कि गोविंद राम जिताऊ उम्मीदवार है। साथ ही यह भी मालूम होना चाहिए था कि यहां बड़े ठाकुर के समर्थन वाला गुट पूरी तरह सक्रिय है। बावजूद इसके इस सीट की हार के लिए 19 का पहाड़ा पढ़ा जा रहा है ।
फतेहपुर, अर्की, जुब्बल कोटखाई और मंडी विक्रम ठाकुर, राजीव सैजल, सुखराम चौधरी की तरफ यदि संगठन सामने की ओर एक उंगली करता है तो 3 अंगुलियां खुद की तरफ भी होती है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि प्रदेश में अब ना तो 2022 के लिए सत्ता में परिवर्तन फायदेमंद होगा और ना ही संगठन में छेड़छाड़। बल्कि नाराज लोगों को कैसे मनाया जाए। जिला कार्यकारिणी के साथ मंडल की भागीदारी और मजबूती से सुनिश्चित की जाए।
कार्यकर्ता का मान सम्मान कैसे और मजबूत हो इन पर भी मंथन होना जरूरी है। संगठन में एक गुट अपने ही मुख्यमंत्री को कमजोर साबित कर रहा है और जो दूसरा गुट है वह दोनों तरफ से मानसिक दबाव की चक्की से गुजर रहा है। हालांकि शीर्ष नेतृत्व बिलासपुर में अपने भाषण में बड़ा ही अच्छा संदेश देकर गए हैं बावजूद इसके मीडिया में उछल रही बेवजह परिवर्तन की चर्चाएं थमने का नाम नहीं ले रही है।
एक बात तो माननी पड़ेगी कि प्रदेश में वीरभद्र सिंह के बाद जयराम ठाकुर एक ऐसे मुख्यमंत्री साबित हुए हैं जो अपने 4 साल के कार्यकाल में वह भी कोरोना जैसे पूर्ण विराम काल में लगातार जनता के साथ प्रदेश के विकास में दौड़ता रहा है।