नाहन ( हिमाचल वार्ता न्यूज)गिरिपार के रेणुका और शिलाई क्षेत्र में जहां माघी त्यौहार पर हजारों बकरों का बलिदान दिया जाता है जिस पर हर वर्ष इस क्षेत्र के लोग करोड़ों रूपये लुटाते हैं । वहीं पर गिरिपार के राजगढ़ क्षेत्र के कुछ गांव को छोड़कर माघी पर्व सामान्य त्यौहार के रूप में मनाया जाता है । मकर सक्रांति से दो दिन पूर्व राजगढ़ क्षेत्र में आटा को गुड़ में पकाया जाता है और इसे देसी घी के साथ खाया जाता है । इसे स्थानीय भाषा में डिमलांटी कहा जाता है । लोहड़ी वाले दिन रात्रि को हर घर में परंपरा के अनुसार अस्कली अथवा सिडडू बनाए जाते हैं । हालांकि लोहड़ी पर रात्रि को अलाव जलाने की प्रथा नहीं है परंतु त्रिगर्त से कांफी वर्ष पहले कारोबार करने आए कुछ परिवार लोहडी पर अलाव अवश्य जलाते हैं तथा रेवड़ी मूंगफली अर्पित करके अग्निदेव की पूजा करते हैं ।
सूर्य उतरायण होने पर इस क्षेत्र में मकर सक्रांति पर देवपूजा का विशेष विधान माना जाता है । मकर सक्रांति के दिन समूचे राजगढ़ क्षेत्र के लोग अपने कुल देवता अथवा देवी के मंदिर में दर्शनों को जाते है । लोगो का विश्वास है कि मकर सक्रांति को सूर्य उतरायण होने पर की जाने वाली पूजा से क्षेत्र में सुख समृद्धि और खुशहाली का सूत्रपात होता है । मकर सक्रंाति को प्रत्येक घर में पारंपरिक व्यंजन पटांडे, लुशके और खीर इत्यादि बनाते हैं । बदलते परिवेश में लोगों ने मकर सक्रांति पर उड़द की खिचड़ी बनाना भी पसंद करते हैं । इस पर्व का दूसरा पहलु यह है कि बुद्धिजीवी लोग माघ महीने में मांस मदिरा का उपयोग करना निषेध मानते हैं क्योंकि इस महीने को धार्मिक महीना माना जाता है । कुछ लोग माघ महीने में विशेष पूजा पाठ, जप, यज्ञ करवाना उचित समझते हैं।
इसी प्रकार गिरिपार क्षेत्र में मकर सक्रंाति से दो दिन पहले अर्थात 28 गते पौष माह को आरंभ होता है जिसमें संभवतः हर घर में बकरा काटने की परंपरा आज भी कायम है । एक माह तक चलने वाले इस त्यौहार में लोग अपने पूरे वर्ष भर की कमाई बकरे खरीदने में लगा देते हैंे । अधिकांश परिवार अपने घरों में साल भर बकरे को पालते हैं जिसे त्यौहार पर काटते हैं । इस दौरान समूचे माघ महीने में मेहमानवाजी का दौर चलता है जिसमें लोग विशेषकर अपनी बहनों व बेटियों को आमंत्रित किया जाता हैं । गिरिपार का यह सबसे मंहगा त्यौहार माना जाता है । कुछ सामाजिक संस्थाएं बलि प्रथा को बंद करने के पक्षधर है । काफी परिवारों ने बलि प्रथा को तिलांजलि देकर अब इस त्यौहार को सामान्य रूप से मनाना आरंभ कर दिया है ।
पारंपरिक त्यौहार जहां लोगो में आपसी प्यार एवं सद्भावना का संदेश देते है वहीं पर इनके आयोजन से लोगो में पारस्परिक मेलजोल के साथ-साथ राष्ट्र की एकता और अखण्डता को भी बल मिलता है।
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Thursday, September 3
