नाहन ( हिमाचल वार्ता न्यूज) (एसपी जैरथ):-हिमाचल प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने वाले और “हिमाचल निर्माता” के रूप में विख्यात डॉ. यशवंत सिंह परमार की जयंती पर हर वर्ष प्रदेश की राजनीति श्रद्धांजलियों, पुष्पांजलि कार्यक्रमों और बड़े-बड़े बयानों से गूंज उठती है। लेकिन जयंती बीतते ही मानो उनकी विरासत भी राजनीतिक गलियारों से ओझल हो जाती है। सवाल यह है कि जिस व्यक्तित्व ने हिमाचल को अलग पहचान दिलाई, क्या उनकी जन्मस्थली और परिवार को वह सम्मान मिला, जिसके वे वास्तविक हकदार हैं?
प्रदेश में वर्षों तक कांग्रेस और भाजपा दोनों की सरकारें रहीं। वर्तमान में केंद्र में भाजपा की सरकार है तो प्रदेश में कांग्रेस सत्ता में है, लेकिन डॉ. परमार के परिवार का कोई सदस्य आज किसी बड़े राजनीतिक, बोर्ड, निगम अथवा संवैधानिक पद पर नजर नहीं आता। ऐसे में यह सवाल लगातार उठता रहा है कि क्या दोनों प्रमुख दलों ने डॉ. परमार के नाम का राजनीतिक उपयोग तो किया, लेकिन उनकी विरासत को उसी अनुपात में सम्मान नहीं दिया। राजनीतिक उपेक्षा का मुद्दा केवल परिवार तक सीमित नहीं है। डॉ. परमार की जन्मस्थली चनालग (बागथन क्षेत्र) आज भी अपेक्षित पहचान और विकास की राह देख रही है। दशकों बाद भी यहां उनके नाम पर एक भव्य संग्रहालय का सपना अधूरा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस नेता ने हिमाचल की नींव रखी, उसकी जन्मस्थली को प्रदेश के प्रमुख विरासत स्थलों में शामिल किया जाना चाहिए था।
डॉ. परमार के पुत्र एवं पूर्व विधायक कुश परमार भी अपने राजनीतिक जीवन के बाद अपेक्षित सम्मान नहीं पा सके। वहीं उनके पौत्र आनंद परमार वर्तमान में जिला सिरमौर कांग्रेस के अध्यक्ष हैं, लेकिन अब तक उन्हें किसी बोर्ड या निगम में जिम्मेदारी नहीं मिली।
