हमीरपुर ( हिमाचल वार्ता न्यूज)(लेखक राजकुमार शर्मा) श्रीकृष्ण जन्माष्टमी केवल भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का पर्व नहीं, बल्कि यह धर्म, कर्म, प्रेम, विवेक और संघर्ष के बीच आशा की नई किरण का उत्सव है। भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी की आधी रात को मनाया जाने वाला यह पर्व भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना में विशेष स्थान रखता है। श्रीकृष्ण का जन्म ऐसे समय हुआ, जब मथुरा में कंस का अत्याचार चरम पर था। माता-पिता कारागार में बंद थे और चारों ओर भय का वातावरण था। ऐसे घने अंधकार के बीच कृष्ण का जन्म यह संदेश देता है कि परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों, परिवर्तन और प्रकाश की संभावना कभी समाप्त नहीं होती। कृष्ण का व्यक्तित्व अनेक आयामों से भरा है। वे बाल गोपाल हैं तो कुशल रणनीतिकार भी; वे प्रेम और करुणा के प्रतीक हैं तो अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का साहस भी देते हैं। वृंदावन की उनकी लीलाएँ प्रेम और प्रकृति से जुड़ाव का संदेश देती हैं, जबकि कुरुक्षेत्र में अर्जुन को दिया गया गीता का उपदेश कर्तव्य और कर्म की महत्ता समझाता है। आज के दौर में कृष्ण का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। तनाव, प्रतिस्पर्धा, सामाजिक चुनौतियों और प्राकृतिक आपदाओं के बीच मनुष्य को घबराने के बजाय विवेक, धैर्य और सही निर्णय के साथ आगे बढ़ना चाहिए। कृष्ण का जीवन सिखाता है कि संकट से भागना समाधान नहीं, बल्कि संकट का सामना करते हुए सही कर्म करना ही जीवन का वास्तविक धर्म है। कृष्ण और प्रकृति का संबंध भी हमें पर्यावरण संरक्षण की प्रेरणा देता है। गोवर्धन पर्वत और यमुना से जुड़ी उनकी कथाएँ आज के समय में प्रकृति के साथ संतुलित सह-अस्तित्व का महत्व समझाती हैं। इसलिए जन्माष्टमी के अवसर पर धार्मिक आस्था के साथ पर्यावरण और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझना भी आवश्यक है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कृष्ण को केवल मंदिरों में पूजने के बजाय उनके संदेश को जीवन में उतारा जाए। जब हमारे भीतर सत्य के लिए खड़े होने का साहस, संकट में विवेक, कर्म के प्रति निष्ठा और दूसरों के प्रति करुणा पैदा होगी, तभी वास्तविक अर्थों में कृष्ण जन्माष्टमी सार्थक होगी। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी केवल आस्था का पर्व नहीं, बल्कि धर्म, कर्म और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा है। कृष्ण का जीवन सिखाता है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी साहस और विवेक नहीं खोना चाहिए। आज आवश्यकता है कि हम कृष्ण को केवल पूजें नहीं, बल्कि उनके विचारों और आदर्शों को अपने जीवन में अपनाएँ। कृष्ण का संदेश स्पष्ट है—अंधकार स्थायी नहीं होता; कर्म, सत्य और विवेक के साथ आगे बढ़ने वाला व्यक्ति अंततः प्रकाश की ओर पहुँचता है।
