मंडी ( हिमाचल वार्ता न्यूज़ ) इलाका उत्तरशाल का पराशर क्षेत्र चारों तरफ से पहाड़ियों से घिरा हुआ है। यहां ओरोग्राफिक प्रभाव के चलते अकसर बादल फटते हैं। कई सालों से बादल फटने की घटनाओं से पराशर की पहाड़ी में लगातार भूस्खलन हो रहा है। यह कभी भी तबाही मचा सकता है। यहां कोटरोपी जैसे हालात बन सकते हैं। इसका खुलासा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मंडी के स्कूल ऑफ सिविल एंड इन्वायमेंटर इंजीनियरिंग विभाग की तीन सदस्यीय टीम के पांच से छह साल के शोध में हुआ है।भविष्य में यदि भूस्खलन की दिशा बदलती है तो पराशर झील पर भी खतरा मंडरा सकता है। टीम के शोध में यह साफ है कि बादल फटने जैसी घटनाएं आगे भी पेश आती रहेंगी। हाल ही में राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ल के पराशर दौरे में टीम ने यह मामला उनके समक्ष भी उठाया। शोध में सामने आया है कि पहाड़ियों से घिरे होने के कारण यहां बादल पहुंचकर अटक जाते हैं। बादलों के पहाड़ से टकराने के बाद खूब बारिश होती है।
अत्यधिक बारिश को बादल फटने की संज्ञा दी जाती है। बादल फटने के बाद एक ही जगह में काफी भूस्खलन हो रहा है। यहीं का मलबा बादल फटने के बाद बागी गांव तक पहुंचता है और तबाही मचाता है। पिछले कई सालों से बादल फटने के बाद पराशर झील से करीब 500 मीटर दूरी पर एक जगह लगातार भूस्खलन हो रहा है। भूस्खलन बागी की तरफ को हो रहा है। यहां बड़ी चट्टानें और पत्थर बादल फटने पर बागी की तरफ बहती हैं।
सैटेलाइट इमेज में इसे साफ देखा जा सकता है। बागी से भूस्खलन वाली जगह 500 मीटर ऊंचाई पर है। ऐसे में जब बादल फटता है तो पानी के तेज बहाव के साथ बड़े पत्थरों और चट्टानों की गति भी तेज होती है और इससे काफी नुकसान होता है। आईआईटी मंडी के स्कूल ऑफ सिविल एंड इन्वायरमेंटल इंजीनियरिंग विभाग के अध्यक्ष सहायक प्रोफेसर डॉ. डीपी शुक्ला, सहायक प्रोफेसर डॉ. दीपक स्वामी, लैंड स्लाइड एक्सपर्ट डॉ. केवी उदय टीम में शामिल रहे।
पराशर क्षेत्र में बादल फटने जैसी घटनाओं के चलते नुकसान हर बार पेश आता है। ऐसे में जरूरी है कि क्षेत्र में हर बड़े निर्माण कार्य में आईआईटी मंडी का सहयोग लिया जाए। आईआईटी मंडी की तकनीक के जरिये नुकसान को कम से कम किया जा सकता है। पराशर क्षेत्र में बादल फटने की घटनाएं प्राकृतिक हैं, इन्हें रोका नहीं जा सकता है। – डॉ. दीपक स्वामी, शोधकर्ता टीम के सदस्य
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Wednesday, June 3
