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    Home»हिमाचल प्रदेश»लसुहन में लगे झुलसा रोग से किसान परेशान
    हिमाचल प्रदेश

    लसुहन में लगे झुलसा रोग से किसान परेशान

    By Himachal VartaMay 9, 2023
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    हिमाचल वार्ता न्यूज़
    नाहन हिमाचल वार्ता न्यूज़  (एसपी जैरथ) :- राजगढ़ क्षेत्र में लसुहन में लगे झुलसा रोग (ब्रोट्राईटस ) से किसान काफी चिंतित है। हालांकि लसुहन की फसल इन दिनों हार्वेस्टिंग पर आ चुकी है । किसानों का कहना है कि झुलसा रोग लगने से जहां लसुंहन का उत्पादन कम होगा वहीं पर उचित दाम नहीं मिलेगें  । खेतों में लसुहन की पत्तियां का रंग पीला पड़ गया है ।  गौर रहे कि अदरक के उपरांत  गिरिपाार क्षेत्र के किसानों द्वारा  लसुहन का बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू कर दिया है । लसुहन की फसल किसानों की आय का प्रमुख साधन बन गई हे । सिरमौर का लसुहन गुणवता और स्वाद में सबसे अच्छा माना जाता है जिस कारण देश व विदेश में सिरमौर के लसंुहन की काफी मांग रहती है । कृषि विभाग के अनुसार सिरमौर जिला में चार हजार हैक्टेयर भूमि पर लसुहन की खेती की जाती है जिससे हर वर्ष औसतन 60 से 70 हजार मिट्रिक टन लसुहन का उत्पादन होता है ।
    वैसे भी बीते दो वर्षों से चेन्नई एवं महाराष्ट्र की मंडी में लसुहन का अधिकतम रेट 120 रूपये प्रतिकिलोग्राम रहा है । बीते वर्ष भी कई महीनों तक किसानों ने लसुहन को स्टोर करके रखा था परंतु जब लसुहन के रेट में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई तो औनेपौने दाम में बेचना पड़ा ।
    कृषि विशेषज्ञ (एसएमएस) राजगढ़ डाॅ0 हीरा लाल आजाद ने बताया कि राजगढ़ क्षेत्र मंें लसुहन के अतिरिक्त टमाटर, मटर, शिमला मिर्च, फ्रांसबीन जैसी नकदी फसलों का काफी मात्रा में उत्पादन किया जाता है । लसुहन में लगे झुलसा रोग के उपचार के लिए विभाग द्वारा किसानों को 25 प्रतिशत ईसी डिफेंकोनाजोल तथा  येलो रेस्ट रोग के लिए 25 ईसी अथवा हेक्साकोनाजोल 5 ईसी और बुटाकोनाजोल फ्यूजेरियम विल्ट का छिड़काव करने की सलाह दी गई है । डाॅ0 आजाद ने बताया कि झुलसा रोग से लसुहन की जड़ों और पत्तियों को नुकसान पहूंचता है जबकि येलो रस्ट से पत्तियां पीली पड़ जाती है जिसे छूने से पत्तियों से धूल गिरती है । इस रोग का शुरूआती दौर से उपचार किया जाता जरूरी है । बताया कि लसुहन की फसल रबी की फसल के साथ लगाई जाती है। लसुहन की फसल में किसानों को ज्यादा मेहनत की आवश्यता नहीं होती है । करीब 5-6 मास के भीतर फसल तैयार हो जाती है । गिरिपार के लसुहन की दक्षिण भारत की मंडियों में बहुत मांग है । पहाड़ी लसुहन का इस्तेमाल आयुर्वेदिक दवाएं निर्मित करने के लिए किया जाता हैॅ । सिरमौर के लसुहन की विदेश में भी निर्यात किया जाता है ।
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