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    Home»हिमाचल प्रदेश»इस बार जन्माष्टमी का सस्पेंस
    हिमाचल प्रदेश

    इस बार जन्माष्टमी का सस्पेंस

    By Himachal VartaAugust 9, 2020
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    इस बार जन्माष्टमी की तिथि पर फंस गया है पेच- बता रहे हैं आचार्य केशवानंद रतूड़ी

    जन्माष्टमी के लिए दो तिथियां और इस दिन यह उपाय आपके लिए होगा लाभदायक….

    नाहन। भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन भगवान विष्णु के आठवें अवतार कृष्ण का जन्म हुआ था। भगवान कृष्ण का जन्म अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था इसलिए इस तिथि का सनातन धर्म में विशेष महत्व है। इस दिन लोग व्रत, पूजन और उत्सव मनाते हैं। कहीं भगवान की पालकी सजाई जाती है तो कहीं झांकी निकाली जाती है। लेकिन इस बार जन्माष्टमी तिथि का ऐसा पेच फंसा है, जिसको लेकर भक्तों के अंदर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। इस साल कृष्ण जन्माष्टमी 11 और 12 अगस्त दो दिन दिन देखने को मिल रही है।

    भगवान कृष्ण का जन्म अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। लेकिन कई बार ऐसी स्थिति बन जाती है कि अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र दोनों एक ही दिन नहीं होते। इस बार भी कृष्ण जन्म की तिथि और नक्षत्र एक साथ नहीं मिल रहे हैं। 11अगस्त को सुबह 9 बजकर 07 मिनट के बाद अष्टमी तिथि का आरंभ हो जाएगा, जो 12 अगस्त को 11 बजकर 17 मिनट तक रहेगी। वहीं रोहिणी नक्षत्र का आरंभ 13 अगस्त को सुबह 03 बजकर 27 मिनट से 05 बजकर 22 मिनट तक रहेगा।शास्त्रों में इस तरह की उलझनों के लिए एक आसान सा उपाय बता गया है कि गृहस्थों को उस दिन व्रत रखना चाहिए जिस रात को अष्टमी तिथि लग रही है।

    पंचांग के अनुसार, 11 अगस्त दिन मंगलवार को गृहस्थ आश्रम के लोगों को जन्माष्टमी का पर्व मनाना सही रहेगा क्योंकि 11 की रात को अष्टमी है। गृहस्थ लोग रात में चंद्रमा को अर्घ्य दें, दान और जागरण कीर्तन करें और 12 अगस्त को व्रत का पारण करें और कृष्ण जन्मोत्सव धूमधाम से मनाएं, जो कि श्रेष्ठ एवं उत्तम रहेगा। जो लोग वैष्णव व साधु संत हैं, वे 12 अगस्त को व्रत रख सकते हैं। 12 अगस्त को सुबह 11 बजकर 17 मिनट तक अष्टमी तिथि रहेगी और उसके बाद नवमी तिथि लग जाएगी। इस दिन अष्टमी और नवमी दोनो रहेंगी। साथ उस दिन कृतिका नक्षत्र बन रहा है। इस दिन कृष्ण जन्मोत्सव का पर्व मनाया जाएगा।

    दरअसल कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत तथा जन्मोत्सव दो अलग-अलग तिथियां हैं। पंचांग के अनुसार, इस साल जन्माष्टमी पर कृतिका नक्षत्र लग रहा है और सूर्य कर्क और चंद्रमा मेष राशि में रहेगा। इस संयोग से वृद्धि योग भी बन रहा है। मथुरा-वृंदावन में एक👍 सालों से पंरपरा रही है कि भगवान कृष्ण जन्माष्टमी के जन्मोत्सव सूर्य उदयकालिक और नवमी तिथि विद्धा जन्माष्टमी मनाने की परंपरा है। गृहस्थ संप्रदाय के लोग कृष्ण जन्माष्टमी मनाते हैं और वैष्णव संप्रदाय के लोग कृष्ण जन्मोत्सव मनाते हैं। कृष्ण जन्माष्टमी को मनाने वाले दो अलग-अलग संप्रदाय के लोग होते हैं, स्मार्त और वैष्णव।

    इनके विभिन्न मतों के कारण दो तिथियां बनती हैं। स्मार्त वह भक्त होते हैं जो गृहस्थ आश्रम में रहते हैं। यह अन्य देवी-देवताओं की जिस तरह पूजा-अर्चना और व्रत करते हैं, उसी प्रकार कृष्ण जन्माष्टमी का धूमधाम से उत्सव मनाते हैं। उसी प्रकार वैष्णव जो भक्त होते हैं वे अपना संपूर्ण जीवन भगवान कृष्ण को अर्पित कर देते हैं। उन्होंने गुरु से दीक्षा भी ली होती है और गले में कंठी माला भी धारण करते हैं। जितनी भी साधु-संत और वैरागी होते हैं, वे वैष्णव धर्म में आते हैं।

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